Gita Jayanti

Bhagavad Gita Contribution

21 Bhagavad Gitas 

₨ 3,150.00

32 Bhagavad Gitas 

₨ 4,800.00

54 Bhagavad Gitas 

₨ 8,100.00

108 Bhagavad Gitas 

₨ 16,200.00

216 Bhagavad Gitas

₨ 32,400.00

1008 Bhagavad Gitas

₨ 151,200.00

The Gita Jayanti is celebrated all over India and now in association with ISKCON people are celebrating it all over of the world on Ekadasi, the eleventh day of the lunar month of Margaseersha (December-January). 

Many people do not have enough time to go and
distribute books like Bhagavad Gita on their own.

Now, here’s a opportunity when we can distribute Bhagavad Gita online to others and become instrument in enlightening people to Krishna Consciousness. One can do this any time of the year but we request you to do it all the more during this auspicious month of Gita Jayanti. Book Distribution Marathon you can participate and contribute it as an offering to Srila Prabhpada. ISKCON Ujjain Sankirtan devotees are doing Marathon and travelling all over Madhya Pradesh to distribute Srila

Prabhupada books. We request you to support us in this transcendental book distribution by sponsoring as many Bhagavad Gita books you can. These books will be distributed freely to colleges, schools, pilgrims, jails, libraries etc.

We Welcome Your Donation by Bank Transfer to:
Account Details
Canara Bank
IFSC – CNRB0005085

Account Number – 5085101001081
Beneficiary Name – ISKCON

After transfer, please email sankirtan@iskconujjain.com with transfer details (Name , Date and Amount)

21 Bhagavad Gitas  – ₨ 3,150.00
32 Bhagavad Gitas  – ₨ 4,800.00
54 Bhagavad Gitas  – ₨ 8,100.00
108 Bhagavad Gitas  – ₨ 16,200.00
216 Bhagavad Gitas – ₨ 32,400.00
1008 Bhagavad Gitas – ₨ 151,200.00

All Glories to Srila Prabhupada Transcendental Book Distribution

 

श्रीमद् भगवद्गीता यथारूप अध्याय 18 उपसंहार – संन्यास की सिद्धि:

श्लोक : 68
जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य (भगवद् गीता) बताता है, वह शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा |

श्लोक : 69
इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा |

हमारा आपसे अनुरोध है कि हर साल की तरह इस बार भी और भी ज्यादा उत्साह के साथ हम सब मिलकर और भी ज्यादा लोकों में इस अतुलनीय एवं जीवन को सही दिशा में प्रशस्त कर वास्तविक अर्थ में सुख और समृद्धि तथा शान्ति प्रदान करने वाले इस दिव्य ज्ञान को हमारी जान पहचान वाले या अनजान सभी लोगो तक पहुंचाकार सही मायने में भगवान के कृपा पात्र बनें और यह संदेश सभी को प्रसारित कर इस महान ज्ञान दान के परोपकारी कार्य में सभी को
सहभागी बनाए।

इस दिव्य ज्ञान को अन्यों तक पहुंचाने के लिए आप नीचे लिखित तरीके आपको मददरूप हो सकता है और आप अन्य कोई तरीके से भी अधिक अच्छा कर सकते हैं।

1- अपने घर के सारे सदस्यों को उपलब्ध करें।
2- अपने सगे संबंधी तथा अन्य मित्रों को भेंट के रूप में बांट सकते हैं।
3- अपनी स्कूल या कॉलेज में गुरुजनों को या अच्छे नंबर लानेवाले विद्यार्थी को बांट कर।
4- आपके ऑफिस में साथी मित्रों को या आपके आश्रय में काम करने वालों को।
5- अगर आपके लिए संभव नहीं हो तो आप हमारे द्वारा आयोजित स्कूल, हॉस्टल या आदिवासी विस्तारों में वितरण के लिए सहायता कर सकते हैं।

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम्
एको देवो देवकीपुत्रएव |
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकंतस्य देवस्य सेवा ||

आज के युग में लोग एक शास्त्र, एक ईश्वर, एक धर्म तथा एक वृतिके लिए अत्यन्त उत्सुक हैं | अतएव एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम् – केवल एक शास्त्र भगवद् गीता हो, जो सारे विश्व के लिये हो | एको देवो देवकीपुत्र एव – सारे विश्व के लिये एक ईश्वर हो – श्रीकृष्ण | एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि और एक मन्त्र, एक प्रार्थना हो – उनके नाम का कीर्तन

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे | हरे राम, हरे राम, राम, राम हरे हरे ||

कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा – और केवल एक ही कार्य हो – भगवान् की सेवा |